भूख अब भी बहुत भूखी है
भूख अब भी बहुत भूखी है
रामनाथ शिवेन्द्र
कौन है जो नहीं जानता कि भूख क्या होती है सभी
जानते हैं कि भूख जैविक अनुभूति है जो खाना खाने से संतृप्त होती है। कहा जाता है कि
भूखे रहने पर भजन भी नहीं हो पाता ‘भूखे भजन न होइ गोपाला।’ भूख एक सामाजिक व राजनीतिक बिमारी की तरह है लोग जानते हुए कि सामने
रहने वाला पड़ोसी भूखा है फिर भी उसकी भूख मिटाने के लिए कोई सार्थक समाधान नहीं निकालते,े
संवेदनात्मक ‘दया’ दिखाते हुए उसे एकाध दिन खाना
खिला देते हैं। इसके अलावा कुछ नहीं करते। भूखे आदमी को इस लायक बनाने का प्रयास नहीं
करते कि वह आदमी भूख से लड़ सके, बिमारी से लड़ सके, विरासत में मिली गरीबी से लड़ सके।
भूखे आदमी या किसी अक्षमित से मिलकर उन्हें एहसास भी नहीं होता कि वह आदमी उनके तथा
उनके जैसे समर्थ लोगों के कारण ही भूखा है प्रकृति ने उसे भूखा नहीं बनाया है। उसे
भूखा बनाया है हमारे समाज ने हमारी सभ्यता ने। प्रकृति के सारे संसाधानों को कुछ लोगों
के हाथों में बांट कर, संसाधनों का मालिक बना कर। ये लोग ही भूखे, गरीब व बेरोजगार
पैदा करते है भूखे लोगों के हाथों से प्रकृति
के सारे संसाधनो को छीन कर। भूख और प्रकृति के संसाधनों में गहरा अन्तरसंबध है। जमीन
जिसमें खाद्यान्न उत्पादित होते हैं यह वह संसाधन है जिससे भूखा आदमी पूरी तरह से वंचित
होता है इसके पहले ‘वन’ भूखे लोगों का भूख से बचाव
किया करते थे जो आज प्रतिबंधित क्षेत्र के रूप में जाने जाते हैं। ये वही ‘वन’ हैं जो हमारे पुरखों के लिए किसी स्कूल की तरह हुआ करते थे और हमारे
पुरखे वनोपज के आहार सेे ही सीख पाते थे कि क्या खाना है और क्या नहीं खाना है। आज
प्रकृति रूपी शिक्षक ‘वन’ को प्रतिबन्धित क्षेत्र घेषित
कर दिया गया है।
आइए अपनी विकसित दुनिया की तस्वीर देखते हैं।
दुनिया में प्रति घंटे भूख से मरने वालों की संख्या 3400 व्यक्तियों की है तथा प्रति
वर्ष यह संख्या 3,15,3600 तक जा पहुंचती है। तो यह है चॉद और मंगल पर पहुंचने तथा ऐटम
बम बनाने वाली दुनिया की तस्वीर। भारत में भूख से मरने वालों की संख्या अधिरिक ढंग
से नहीं बताई गई है एक आंकड़ा है कि भूख के सन्दर्भ में भारत 107वें पायदान पर है कुल
115 देशों की तुलना में। 2021 में 74दश्मलव 1 प्रतिशत लोग स्वस्थ आहार लेने में असमर्थ
हैं। भूख से होने वाली मौतें 7000 से अधिक हैं... संदर्भ ‘ग्लोबल हन्गर इन्डेक्स दृष्टि
आइ. ए. एस.’। हम यहां केवल भूख की बात कर रहे हैं कुपोषण का सन्दर्भ तो दिल दहला देना
वाला है। उसकी चर्चा फिर कभी। हालांकि कुपोषण का मामला भी भूख से ही जुड़ा हुआ है।
हमें समझना चाहिए कि किसी समय में यह जो भूख है
सिर्फ एक जैविक समस्या रही होगी पर आज के उपभोक्तावादी व तकनोलाजी के असीमित व गैरजरूरी
प्रबंधन के समय में भूख अपनी कुदरती जैविक समस्या के साथ साथ सामाजिक, राजनीतिक और
सांस्कृतिक समस्या के रूप में तब्दील होकर मनुष्य की संप्रभुता को चोटिल कर रही है।
भूख और आदमी तथा भूख और भोजन के बीच किसिम किसिम के खतरनाक आर्थिक व संसाधनिक विभाजनों
ने कई तरह की भिन्नताओं को सृजित किया है जिससे लगता है कि गरीबी हो या भूख ये दैविक
नहीं हैं वरन् इन दोनों को सत्ता प्रबंधनों ने सायास निर्मित (बतमंजम) किया है। भूख
की जैविक समस्या पहले वैयक्तिक हुआ करती थी पर अब ऐसा नहीं है। यह सामाजिक व राजनीतिक
समस्या के रूप में हमारी सभ्यता की मर्यादाओं को विरूपित कर रही है। हमारी मानव सभ्यता
में सांस्कृतिक या सामाजिक भेदमूलकता थी ही नहीं जो आज हर तरफ दीख रही है। सामाजिक
भेदमूलकता के कारण आज के समय में भूख और भोजन के बीच काफी दूरी आ गई है। एक किनारे
भूख छटपटा रही है तो दूसरे किनारे भोजन के सारे संसाधन तथाकथित सभ्य कहे जाने लोगों
के कब्जे में हो कर सोहर गा रहे हैं। भूख और भोजन की बीच की दूरी ही आदमी और आदमी के
बीच दूरी बढ़ा रही है। जिस दूरी को जानबूझ कर फैलाया जा रहा है।
ये जो समाज में धमर्, जाति, गोत्र के कई कई खाने
दीख रहे हैं तथा उनके नाम पर जो उन पर नेतृत्व करने का एक मतलबी रूप दीख रहा है उसे
जानबूझ कर सायास प्रतिस्थापित किया जा रहा है और हमारी प्राकृतिक संस्कृति सहभागिता
तथा वन्धुत्व को खंडित करते हुए एक तरह के नये सत्य को स्थापित किया जा रहा है। एक
वह जो प्राकृतिक सत्य है कि आदमी और आदमी के बीच में कोई अन्तर नही होता,ं भूख तथा
भोजन के बीच संतुलन होना ही चाहिए इस सत्य के ऊपर नये तरह का सत्य चिपका दिया गया है
कि जो गरीब है जो भूखे हैं वे जानबूझ कर गरीब और भूखे हैं, वे भूख तथा गरीबी से बाहर
निकलना ही नहीं चाहतें। उनका गरीब होना भूखा होना यह पूरा मामला दैवीय है, उन्हें गरीब
बनाया नहीं गया है, गरीब और अमीर होना ईश्वर की कृपा पर है। परमात्मा की जिस पर कृपा
हो गई वह भूख तथा गरीबी दोनों से बाहर निकल जायेगा। इसी कल्पित सत्य के साथ दूसरा सत्य
चिपकाया गया कि ‘आदमी चाहे तो वह सभ्य व सांस्कृतिक प्राणी बने रहते हुए गरीबी तथा
भूख से बाहर निकल सकता है। इस गढ़े हुए सत्य के आधार पर समझााया जा रहा है कि यह जो
आदमी और आदमी के बीच की दूरी है या भूख और भोजन के बीच की जो दूरी है वह दैवीय है उसे
सत्ता प्रतिष्ठानों या उससे जुड़े लोगों ने
नहीं उपजाया है जबकि यह सरासर गलत स्थापना है। सत्य यह है कि गरीबी तथा भूख दोनों सत्ता
तथा सत्ता प्रबंधकों द्वारा सायास उपजाये जाते हैं। तभी तो उन्हें शर्म भी नहीं होती
है कि है जहां बेरोजगार होंगे, कमाई के साधन संसाधन नहीं होंगे वहां गरीबी रहेगी उससे
जुडी तथा उसके साथ चलने वाली भूख भी रहेगी।
आज हमारे देश में अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त में
राशन दिया जा रहा है जिसे भूख के खिलाफ युद्ध की तरह बताया जा रहा है। सवाल है आखिर
अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त में राशन क्यों दिया जा रहा है? इसे भी बताया जाना चाहिए
तथा सामाजिक संरचना के बारे में साफ साफ बताया जाना चाहिए कि सामाजिक सरंचना की भेदमूलकता
तथा साधनों व संसाधनों पर कुछ खास समूहों (गिरोहों) के हाथ में भूख और गरीबी मिटाने
वाले संसाधनों को बिना किसी कारण के प्रदान कर देना, संसाधनों पर उनके अधिकारों को
प्रतिस्थापित कर देना यह वह विशेष कारण है जिससे गरीबी तथा भूख दोनों उत्पादित होती
हैं। और भूख मिटाने के लिए मुफ्त राशन का वितरण यह भूख के खिलाफ युद्ध कैसे हो सकता
है युद्ध तो तब होता जब भूख उत्पादित करने वाले साधनों का गरीबों व भूखों में समानुपातिक
वितरण सुनिश्चित किया जाता। यह कितना हास्यास्पद है कि मुफ्त में राशन लेने वालों को
‘लाभार्थी’ समूह बोला जाता है क्या यह
उनका अपमान नहीं किया जाता ऐसा बोल कर। यह युद्ध का एक रूप होता अगर मुफ्त वाले राशन
के साथ आदमी के दोनों हाथों को काम भी दिया जाता। उन्हें उनकी योग्यता के अनुसार काम
दिया जाता तथा काम के अनुसार उन्हें उचित दाम दिया जाता। फिर तो न गरीबी रहती और न
भूख। ऐसा इस लिए है कि अब तक की सरकारें कभी भी भूख के या गरीबी के या बेरोजगारी के
सन्दर्भ में शर्म नहीं महसूस करने वाली या लजाने वाली नहीं रही हैं वल्कि वे अपनी आबादी
पर घृणा करने वाली ही रही हैं। जो घोषित करती है कि जनसंख्या की वृद्धि भूख, गरीबी
तथा बेरोजगारी का कारण है जबकि प्रमाणित है कि भारी मशीनीकरण बेरोजगारी का कारण है।
समाज वैज्ञानिकों का माना है कि भारी मशीनी करण मानवीय श्रम को छीन लेता है हाथ से
किए जाने वाले काम भी मशीनें करने लगती हैं।
कोई सत्ता ब्यवस्था ऐसी भी हो सकती है जिसके पास
जनसंख्या का हिसाब हो, उसके चाल-चरित्र पर किसी भी तरह का अविश्वास भी न हो यानि एक
ऐसी जनसंख्या जो आज्ञाकारी हो, जो विमुद्र्रीकरण के कानून को सरासर सच मान लेती हो
और घर में कटौती से बचाये गये रुपयों को बदलवाने के लिए बैंको के सामने कतार में खड़ी
हो जाती हो। जो सरकार के विस्थापन नीति को राजाज्ञा मान कर स्वयं विस्थापित हो जाती
हो, जो बुलडोजर से गिरती हुई अपनी झोपड़ियां देखती हो और आज्ञाकारी बनी रहती हो। मतदान
के समय पोलिंग बूथ पर जा कर अपना नाम तलाशती हो कि मतदाता सूची में उसका नाम है कि
नहीं, मतदाता सूची में नाम न न होने पर सिर झुकाये अपने घर चली जाती हो ऐसी आज्ञाकारी
जनता के दोनों हाथों को काम न देकर जो सरकार खुद को सनातनी कहती हो, संस्कृति को बचाने
वाली कहती हो और एक बिल्कुल नये तरह का मिथ्या सच समाज में स्थापित करती हो कि ‘सरकार
का काम रोजगार करना व चलाना नहीं है। इस फार्मूले के तहत जनता को समझाती हो आप काम
न तलाशिए, नौकरी मत मांगिए नौकरी देने वाला बनिए। जब सत्ता प्रतिष्ठानो से पूछा जाता
है कि एक आदमी नौकरी देने वाला कैसे बन सकता है इस सवाल पर सरकार तथा सरकारें दोनों
मुह और कान दोनों बन्द कर लेती हैं। मुफ्त में राशन देना यह युद्ध कैसे हो सकता है
यह तो कायर बनाना है कमजोर बनाना है और आदमी की क्षमताओं का अपमान करना है। एक तरफ
बहुसंख्यक आदमी की क्षमताओं का अपमान तो दूसरी तरफ प्रतिभा परीक्षा पास करने लेने वालों
को विशेष पद और जिम्मेवारी दे कर सम्मान जिसे नौकर शाह कहा जाता है। गंभीरता से देखा
जाये तो ये जो नौकर शाह होते हैं ये ही सरकार चलाते हैं और उनके साथ जो नेता होता है
मंत्री, मुख्यमंत्री आदि के रूप में वह तो केवल एक शो पीस की तरह होता है। मजा यह कि
हम सत्ता की इस पद्धति पर काफी गौरवान्वित भी होते हैं और यह नहीं समझ पाते कि हमारे
बीच से ही नौकरशाहों को चुनकर निकाला जाता है सरकार चलाने के लिए सवाल उठता है गॉव
कौन चलायेगा? बहुसंख्यकों को कौन नेतृत्व करेगा? तो एक दूसरे अर्थ में बहुसंख्यकों
को नेतृत्व हीन बनाये रखने के लिए सरकारें बहुसंख्यकों के बीच से ही वुद्धि बलियों वे देह बलियों दोनों को निकाल कर
सरकार की संरचना में शामिल कर लेती है और बहुसंख्यकों की सारी ताकत को कमजोर बना देती
है। इतना ही नहीं बहुसंख्यकों के बीच से ही सरकारें नेताओं को भी खींच लेती हैं जिनमें
कुछ संगठनात्मक क्षमता देखती है उन्हें जाति का नेता, धर्म का नेता, संप्रदाय का नेता
बना लेती है। तो सरकार का यह खेल सिर्फ गरीबी और भूख दोनों को यथावत बनाये रखने के
लिए खेला जाता है।
यह जो हमारी भूख है आज के समय में ऑकड़ों का एक
हास्यास्पद खेल बन चुकी है जो आदमी और आदमी के बीच भयंकर खांई पैदा करती है। यह खांई
जन असंतोष से छलांग कर जन प्रतिरोध के रास्तों का निर्माण करती है और इससे थोड़ा आगे
बढ़कर रास्ट्र के होने तथा न होने तक जा पहुचती है और राष्ट्रवाद की अवधारणा को संशय में डालने का काम
करती है। इतना ही नहीं हमारी सभ्यता पर सवाल दागते हुए हमें परम असभ्य होने के खांचे
में डाल देती है। आखिर वह राष्ट्र ही कैसा? जो अपनी जनसंख्या का सम्मान करना नहीं जानता।
राष्ट्र तो तब बनता है जो अपनी बहुसंख्यक जनता के हितों के लिए अपनी सत्ता का जनता
के प्रति पूर्णतया तथा स्पष्ट रूप से समर्पण का भाव प्रदर्शित करता हो तथा बहुसंख्यक
को प्रथम का स्थान देता हो और साबित करती हो कि सत्ता सबका साथ के लिए समर्पित है केवल
मौखिक प्रवचन के रूप में नहीं। ऐसा तभी संभव हो सकता है जब सत्ता संभव बराबरी का भाव
व धारणा लिए जनता को काम देना शूरू करे और ठान ले कि योग्यता के अनुसार काम और काम
के अनुसर दाम देना ही उसकी कार्य पद्धति का संविधन है।
यह सुनिश्चित है कि भूख और भोजन के बीच की दूरी
हो या आदमी और आदमी के बीच की दूरी हो उसके समाधान के लिए पेट से बोलना होगा कंठ से
नहीं। अब तक तो कंठ से ही लोकतंत्र का चलाया जा रहा है पेट की आवाज से नहीं जब सरकारें
पेट की सुनने लगेंगी जहां भूख है फिर तो सत्ता प्रंबंधन का पूरा मिजाज ही गीतमय हो
जायेगा। कंठ से बोले गये संवाद या नारे बनावटी होते हैं जबकि पेट से बोले गये संवाद
कुदरती होते हैं एकदम सही सही। अब तो केवल इतना ही कहा जा सकता है कि भूख पहले यानि
गुलामी के समय में भी भूखी थी और आजादी के बाद भी भूखी है शायद भूख ही सनातन है और
जीवन आधुनिक।

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